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पुसौर —प्रशासनिक अनिर्णय और सियासी टकराव में फंसा पुसौर का विकास

लक्ष्य न्यूज़ रायगढ़ : पुसौर शशि भूषण गुप्ता किसी भी ग्रामीण अंचल को जब ‘नगर पंचायत’ का दर्जा दिया जाता है, तो इसके पीछे मूल मंशा यही होती है कि क्षेत्र को शहरी तर्ज पर बेहतर बुनियादी सुविधाएं—पक्की सड़कें, निर्बाध जल निकासी, समुचित स्वच्छता और आधुनिक नागरिक सेवाएं—उपलब्ध हों। रायगढ़ जिले की पुसौर नगर पंचायत इस उम्मीद पर कितनी खरी उतर पाई है, इसका आकलन यहां के जर्जर रास्तों, अधूरे पड़े निर्माण कार्यों और वार्डों में फैले नागरिक असंतोष को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है। कागजों पर ‘शहरी निकाय’ का तमगा लगने के बावजूद जमीनी हकीकत आज भी किसी बदहाल कस्बे से भिन्न नजर नहीं आती।

पुसौर का वर्तमान संकट महज बजट की कमी का नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के आपसी सियासी टकराव और प्रशासनिक तालमेल के भारी अभाव का परिणाम है। जब नगर पंचायत के अध्यक्ष, पार्षद और प्रशासनिक अधिकारी (सीएमओ) विकास के साझा एजेंडे पर एक साथ बैठने के बजाय राजनीतिक शह-मात और गतिरोध में उलझ जाएं, तो विकास की गाड़ी का पटरी से उतरना स्वाभाविक है। वार्डों में प्रस्तावित सीसी रोड, नालियों के निर्माण और नियमित रखरखाव के प्रस्ताव फाइलों के फेर और टेंडर की पेचीदगियों में महीनों अटके रहते हैं। जनप्रतिनिधियों का अपनी ही परिषद के खिलाफ असंतोष व्यक्त करना या इस्तीफे तक की नौबत आना यह दर्शाता है कि स्थानीय निकाय का आंतरिक तंत्र विश्वास के गहरे संकट से जूझ रहा है।

इस राजनीतिक और प्रशासनिक खींचतान का सीधा खामियाजा पुसौर की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। मुख्य संपर्क मार्गों से लेकर वार्डों की आंतरिक गलियों तक गड्ढों, धूल और जलभराव का अंबार है। हल्की बारिश होते ही रास्ते दलदल में तब्दील हो जाते हैं और सूखे दिनों में उड़ती धूल पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरा बनती है। जब बुनियादी नागरिक सुविधाओं के लिए भी नागरिकों को आंदोलन की चेतावनी देनी पड़े, तो यह स्थानीय स्वशासन की विफलता का स्पष्ट संकेत है।

स्थानीय प्रशासन और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि जनसेवा दलीय राजनीति और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से ऊपर है। फाइलों से बाहर निकलकर वार्डों की वास्तविक प्राथमिकताओं को पहचानना और अटकी परियोजनाओं को पारदर्शी व समयबद्ध तरीके से पूरा करना ही इस गतिरोध का एकमात्र हल है। जिला प्रशासन को भी चाहिए कि वह इस सुस्ती पर संज्ञान ले और जवाबदेही तय करे। पुसौर को घोषणाओं और टकराव की नहीं, ठोस नीतिगत फैसलों और निष्पक्ष विकास की दरकार है।