
विधियों को ताख पर रखकर कार्य करता है रायगढ़ का राजस्व विभाग

लक्ष्य न्यूज़ रायगढ़ – छत्तीसगढ़ भू राजस्व संहिता 1959 के तहत दस्तावेजों की सत्य प्रतिलिपि प्राप्त करने के लिएआवेदक भानु प्रताप मिश्रा को रायगढ़ कलेक्ट्रेट की नकल शाखा से लेकर अपर कलेक्टर तक का चक्कर लगाना पड़ा। आवेदक को न केवल अधूरे दस्तावेज दिए गए, बल्कि अतिरिक्त शुल्क भी वसूला गया। मामले ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और सूचना के अधिकार के प्रति जिला प्रशासन की प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आवेदन और अतिरिक्त वसूली

आवेदक भानु प्रताप मिश्र ने छत्तीसगढ़ भू राजस्व संहिता 1959 की धारा 256 के तहत दिनांक 8 सितंबर 2026 को रायगढ़ के भू-अभिलेख नकल शाखा में आवेदन प्रस्तुत किया। आवेदन 1966-67 में अनुविभागीय अधिकारी रायगढ़ के एक प्रकरण की समस्त दस्तावेजों की सत्य प्रतिलिपि प्राप्त करने के लिए था। आवेदक ने 100 रुपये की रसीद भी कटवाई।
अगले ही दिन, 9 सितंबर 2026 को नकल शाखा के यादव बाबू ने आवेदक को बताया कि नकल शाखा का प्रिंटर खराब है, इसलिए बाहर से फोटोकॉपी करानी पड़ेगी। इसके चलते 100 रुपये की रसीद के अतिरिक्त आवेदक से 300 रुपये कोर्ट टिकट और फोटोकॉपी के नाम पर लिए गए। इतना ही नहीं, उस प्रकरण के अधूरे दस्तावेजों की सत्य प्रतिलिपि आवेदक को थमा दी गई।
“निलंबित हो जाऊंगा” — अधूरे दस्तावेज का स्पष्टीकरण
जब आवेदक ने पूछा कि प्रकरण का अधूरा दस्तावेज क्यों दिया गया, तो यादव बाबू ने स्पष्टीकरण दिया कि प्रकरण फाइल में संलग्न तत्कालीन कलेक्टर और कमिश्नर द्वारा दिए गए फैसले के आदेश की सत्य प्रतिलिपि नहीं दे सकते, क्योंकि देने पर वे निलंबित हो जाएंगे।
आवेदक ने इसके बाद अपने कई वरिष्ठ विधि विशेषज्ञों से जानकारी ली। विशेषज्ञों ने बताया कि आवेदक को टरकाने और दौड़ाने के लिए ऐसा किया गया है। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि रायगढ़ जिले के राजस्व विभाग और ब्रिटेन की संसद की शक्तियां समकक्ष हैं — दोनों वह काम नहीं कर सकते जो तार्किक रूप से असंभव है, जैसे पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुष सिद्ध करना, लेकिन शक्तियां असीम हैं।
सूचना के अधिकार का सहारा, फिर तहसीलदार को अंतरण
दस्तावेज प्राप्त करने के लिए आवेदक ने 16 सितंबर 2026 को सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत जनसूचना अधिकारी, कलेक्ट्रेट रायगढ़ के नाम विधिवत आवेदन प्रस्तुत किया। जिला जनसूचना अधिकारी रायगढ़ (छ.ग.) सुश्री शिल्पा भगत, डिप्टी कलेक्टर द्वारा इस आवेदन को सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6 (3) के तहत तहसीलदार एवं सह जनसूचना अधिकारी के पास अंतरित कर दिया गया। अंतरण की लिखित सूचना कलेक्ट्रेट रायगढ़ के आवक-जावक से आवेदक को दिनांक 25 सितंबर 2026 को दी गई।
अपर कलेक्टर से शिकायत, निवेदन को बताया “नाटक”
लिखित सूचना पत्र लेकर आवेदक ने अपर कलेक्टर श्रीमान रवि राही के पास मौखिक शिकायत की। शिकायत पर श्री रवि राही ने नकल शाखा के यादव बाबू को बुलाकर आवेदक के सामने कहा कि इनसे नकल के लिए छत्तीसगढ़ भू राजस्व संहिता 1959 की धारा 256 के तहत विधिवत नया आवेदन लेकर दस्तावेजों की सत्यापित प्रतियां आगामी बुधवार से पूर्व उपलब्ध कराई जाएं।
लेकिन नकल शाखा के व्यवहार से आहत आवेदक जब अपनी बात रखना चाहा, तो श्री राही साहब ने आवेदक के निवेदन को नाटक बताकर टाल दिया।
उठे गंभीर प्रश्न
इस पूरे प्रकरण ने कई सवाल खड़े किए हैं – जिस जिले के कलेक्टर से मिलने के लिए जनता को पर्ची नहीं भेजनी पड़ती, जहां जनता सीधे कलेक्टर साहब से मिलकर अपनी बात कह सकती है और समस्याओं के निराकरण का प्रयास भी कलेक्टर साहब द्वारा किया जाता है — वहीं दूसरी ओर उनके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा किसी आवेदक के निवेदन को “नाटक” शब्द से संबोधित करना क्या किसी लोक सेवक की सेवा पुस्तिका का हिस्सा है?
डिप्टी कलेक्टर महोदया द्वारा तहसीलदार रायगढ़ को आवेदन पत्र का अंतरण भी प्रश्न खड़ा करता है कि क्या जिला अभिलेखागार के प्रभारी तहसीलदार हैं?
यह घटना रायगढ़ के राजस्व विभाग पर यह प्रश्न खड़ा करती है कि राजस्व अधिनियमों और सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के संरक्षण को लेकर जिला प्रशासन कितना प्रतिबद्ध है?
आवेदक के अन्य प्रश्न
आवेदक ने कुछ प्रश्न और भी खड़े किए हैं। उनका कहना है कि क्या बीड़ी जलाई ले भद्रता की प्रस्तुति थी और आवेदक का निवेदन नाटक? क्योंकि साहब भी उस कलाकार चयन समिति के सदस्य रहे।
आवेदक ने यह आशा भी जताई है कि रायगढ़ के माननीय विधायक ओ.पी. चौधरी जैसा वेल-एजुकेटेड जन प्रतिनिधि रायगढ़ का प्रतिनिधित्व कर रहा है, इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि दोषियों को दंड और आवेदक को न्याय मिलेगा। आवेदक ने यह भी कहा कि उसने भी चुनाव के दौरान उंगलियों पर स्याही का निशान लगाया था।
यह घटना रायगढ़ के राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और सूचना के अधिकार के प्रति जिला प्रशासन की प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। आवेदक को अधूरे दस्तावेज, अतिरिक्त शुल्क वसूली और उसके निवेदन को “नाटक” कहे जाने जैसी बाधाओं का सामना करना पड़ा। मामले में जनप्रतिनिधि और प्रशासन से न्याय की उम्मीद है।


